कर्मों के इस खेल को जानिए

कर्म क्या है?

दादाश्री का ऐसा माना है ”कोई भी कार्य करो, उसे ‘मैं करता हूँ’ ऐसा आधार दो, वह कर्म की परिभाषा है। ‘मैं करता हूँ’ ऐसा आधार दें, उसे ‘कर्म बाँधा’ कहा जाता है। ‘मैं नहीं करता’ और ‘कौन करता है’ वह जान लो, तो इसे निराधार करते हो न, तब कर्म गिर जाता है” 

2

कर्म के प्रकार 

इन तीन प्रकार के कर्मों का संचय हमारी संस्कार भूमिका में होता है। चित्रगुप्त का परिचय लेख के अंतर्गत पाठक पढ़ चुके हैं कि मनुष्य की अंतःचेतना ऐसी निष्पक्ष, निर्मल, न्यायशील और विवेकवान है कि अपने पराए का कुछ भी भेदभाव करके सत्यनिष्ठ न्यायाधीश की तरह हर एक भलेबुरे काम का विवरण अंकित करती रहती है।    

1

संचित

संचित का अर्थ है – संपूर्ण, कुलयोग| अर्थात, मात्र इस जीवन के ही नहीं अपितु पूर्वजन्मों के सभी कर्म जो आपने उन जन्मों में किये हैं| आपने इन कर्मों को एकत्र करके अपने खाते में डाल लिया है| यदि कोई आप का अपमान करे और आप क्रोधित हो जाएँ तो आपके संचित कर्म बढ़ जाते हैं| परन्तु,यदि कोई अपमान करे और आप क्रोध ना करें तो आप के संचित कर्म कम होते हैं|

sanchit1

प्रारब्ध 

‘प्रारब्ध’, ‘संचित’ का एक भाग, इस जीवन के कर्म हैं| आप सभी संचित कर्म इस जन्म में नहीं भोग सकते क्यूंकि यह बहुत से पूर्वजन्मों का बहुत बड़ा संग्रह है| इसलिए इस जीवन में आप जो कर्म करते हैं, प्रारब्ध, वो आप के संचित कर्म में से घटा दिया जायेगा| इस प्रकार इस जीवन में आप केवल प्रारब्ध भोगेंगे,जो आप के कुल कर्मों का एक भाग है|वे मानसिक कर्म होते हैं, जो स्वेच्छापूर्वक जानबूझकर, तीव्र भावनाओं से प्रेरित होकर किए जाते हैं।

parband

क्रियमाण 

तीसरा कर्म क्रियमाण है,कर्म शारीरिक हैं, जिनका फल प्रायः साथ के साथ ही मिलता रहता है। नशा पिया कि उन्माद आया।विष खाया कि मृत्यु हुई। शरीर जड़ तत्त्वों का बना हुआ है। भौतिक तत्त्व स्थूलता प्रधान होते हैं। उसमें तुरंत ही बदला मिलता है। अग्नि के छूते ही हाथ जल जाता है। नियम के विरुद्ध आहारविहारकरने पर रोगों की पीड़ा का, निर्बलता का अविलम्ब आक्रमण हो जाता है और उसकी शुद्धि भी शीघ्र हो जाती है।

kriya

 

Read more
नव-संवत्सर : ऋतुओं के लेखा-जोखा की असाधारण पद्धति

नई दिल्ली। संवत्सर एक तरह से समय को कालखंड में विभाजित करने की पद्धति है, यानी बारह महीने का एक पूरा काल-चक्र। यह पद्धति सबसे पहले भारत में ही प्रारंभ की गई। वास्तव में यह विभिन्न ऋतुओं का वो हिसाब-किताब है जो सूर्य और पृथ्वी के अंर्तसंबंधों के कारण घटित होता है। संवत्सर असाधारण है। माना जाता है कि ब्रह्माजी ने इसी दिन सृष्टि का निर्माण किया था।

इस दिन विशेष रूप से ब्रह्माजी, उनके द्वारा निर्मित सृष्टि के प्रमुख देवी-देवता, यक्ष-राक्षस, गंधर्वो, ऋषि-मुनियों, नदी-पर्वत, पशु-पक्षियों, मनुष्यों, रोगों, कीटाणुओं और उनके उपचारों तक का पूजन किया जाता है। ऋषि याज्ञवल्क्य वाजसनेय द्वारा रचित ग्रंथ ‘शतपथ ब्राह्मण’ के अनुसार, प्रजापति ने अपने शरीर से जो प्रतिमा उत्पन्न की उसको संवत्सर कहा गया है। इस प्रकार संवत्सर की उपासना, प्रजापति की उपासना है।

ब्रह्माण्ड के पुरातन ग्रंथ वेदों में भी नव-संवत्सर का वर्णन है। यजुर्वेद के 27वें और 30वें अध्याय में क्रमश: 45वें और 16वें मंत्र में इसे विस्तार से भी दिया गया है। इसकी पुष्टि ऋगवेद के ऋत-सूक्त से भी होती है जिसमें कहा गया है ‘समुदादर्णवादाधि संवत्सरो अजायत। अहोरात्रीणि विद्यत विश्वस्य मिषतो वशी।।’

अर्थात प्रजापति ने सूर्य, चंद्र, नक्षत्र, स्वर्ग, पृथ्वी, अंतरिक्ष को रचा और तभी से नव-संवत्सर का आरंभ हुआ। सृष्टि संवत के प्रारंभ का भी यही समय माना जाता है। इसी से सृष्टि की आयु का भी आकलन किया जाता है।

नवंबर 1952 में भारतीय वैज्ञानिक और औद्योगिक परिषद द्वारा एक पंचांग सुधार समिति की स्थापना की गई थी, जिसने 1955 में रिपोर्ट सौंपकर शक संवत् को राष्ट्रीय सिविल कैलेंडर के रूप में भी स्वीकारने की सिफारिश की थी।

तब सरकार के अनुरोध पर ग्रेगेरियन कैलेंडर को सरकारी कामकाज के लिए उपयुक्त मानते हुए भी 22 मार्च, 1957 को शक संवत् आधारित पंचांग राष्ट्रीय कैलेंडर के रूप में स्वीकारा गया था। चैत्र भारतीय राष्ट्रीय पंचांग का प्रथम मास होता है।

यूं तो नव-संवत्सर से जुड़ी कई बातें बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। यह जहां भारतीय नववर्ष के प्रारंभ का दिन है, वहीं यह भी माना जाता है कि इसी दिन 1 अरब, 97 करोड़, 39 लाख, 49 हजार, 108 वर्ष पूर्व ब्रह्माजी ने सृष्टि की शुरुआत की थी। वैज्ञानिक भी पृथ्वी की आयु को लगभग 2 अरब वर्ष मानते हैं।

विक्रम संवत का भी यह पहला दिन माना जाता है। यह हिंदू पंचांग में गणना प्रणाली भी है, जिसकी धारणा है कि यह एक ऐसे राजा के नाम पर प्रारंभ होता है जिसके राज्य में न कोई चोर हो, न अपराधी हो न ही भिखारी। उज्जयिनी (उज्जैन) के सम्राट विक्रमादित्य ने 2068 वर्ष पूर्व इसी दिन अपने राज्य की स्थापना की थी।

मार्च माह से ही दुनिया भर में पुराने कामों को समेटकर नए कार्यो की रूपरेखा तैयार की जाती है। 21 मार्च को पृथ्वी भी सूर्य का एक चक्कर पूरा कर लेती है और रात-दिन बराबर होते हैं। 12 माह का एक वर्ष, 7 दिन का एक सप्ताह रखने की परंपरा भी विक्रम संवत् से ही शुरू हुई है। इसमें महीने का हिसाब सूर्य-चंद्रमा की गति के आधार पर किया जाता है।

विक्रम कैलेंडर की इसी पद्धति का बाद में अंग्रेजों और अरबियों ने भी अनुसरण किया तथा भारत के विभिन्न प्रांतों ने इसी आधार पर अपने कैलेंडर तैयार किए।

हिंदू नववर्ष का आरंभ चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा को शक्ति-भक्ति की उपासना, चैत्र नवरात्रि के साथ प्रारंभ से होता है। पंचांग रचना का भी यही दिन माना जाता है। महान गणितज्ञ भाष्कराचार्य ने इसी दिन सूर्योदय से सूर्यास्त तक दिन, महीना और वर्ष की गणना कर पंचांग की रचना की थी। भारत सरकार का पंचांग शक संवत भी इसी दिन से शुरू होता है।

भारत के लगभग सभी प्रांतों में यह नववर्ष अलग-अलग नामों से मनाया जाता है जो दिशा व स्थान के अनुसार मार्च-अप्रैल में लगभग इसी समय पड़ते हैं। विभिन्न प्रांतों में यह पर्व गुड़ी पड़वा, उगाडी, होला मोहल्ला, युगादि, विशु, वैशाखी, कश्मीरी नवरेहु, चेटीचंड, तिरुविजा, चित्रैय आदि के नाम से मनाए जाते हैं।

भारत में नव-संवत्सर पर पूजा-पाठ का विधान है। पुरानी उपलब्धियों को याद करके नई योजनाओं की रूपरेखा भी तैयार की जाती है। इस दिन अच्छे व्यंजन और पकवान भी बनाए जाते हैं।

इस पर्व पर विभिन्न प्रांतों में अलग परंपराएं अब भी हैं, जिनमें कहीं स्नेह, प्रेम और मधुरता के प्रतीक शमी वृक्ष की पत्तियों का आपस में लोग विनिमय कर एक दूसरे के सुख और सौभाग्य की कामना करते हैं। कहीं काली मिर्च, नीम की पत्ती, गुड़ या मिश्री, आजवायइन, जीरा का चूर्ण बनाकर का मिश्रण खाने व बांटने की परंपरा है।

भारत के लिए यह भी एक गौरव की बात है कि विक्रम संवत का संबंध किसी धर्म विशेष से न होकर संपूर्ण धरा की प्रकृति, खगोल सिद्धांतों और ग्रह-नक्षत्रों से है जो कि वैज्ञानिक आधार और वैश्विक स्वीकार्यता के संभावित कारण तो हैं ही, साथ ही भारत की गौरवशाली परंपरा भी माना जाता है।

हमारे ग्रंथों में उल्लिखित इन बातों का समर्थन अब वैज्ञानिक भी करने लगे हैं और इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि सृष्टि की रचना 2 अरब वर्ष पूर्व हुई होगी। विश्व में सौरमंडल के ग्रहों और नक्षत्रों की चाल व गति निरंतर बदलती रहती है। इन स्थिति पर ही दिन, महीने, साल और उनके सूक्ष्मतम भाग आधारित होते हैं। इन सबकी गणना का एक प्राचीनतम और लगभग प्रमाणित सा आधार संवत्सर ही है।

किसी भी शुभ कार्य के पूर्व विद्वान या ज्योतिषि के पास जाकर शुभ लग्न व मुहूर्त निकलवाया जाता है। इतना ही नहीं जन्म, नामकरण, नया कुछ भी अच्छा करने के अलावा मृत्यु उपरांत भी ग्रह-नक्षत्र के अनुसार, विशेष पूजा पाठ का भी विधान इसी गणना पर आधारित है।

जहां तक विक्रम संवत की बात है, भारत के सांस्कृतिक इतिहास की ²ष्टि से सबसे लोकप्रिय और प्राचीन संवत् माना जाता है। किसी नवीन संवत् को चलाने की शास्त्रीय विधि यह है कि संवत् चलाने के दिन से पहले उस राज्य की जितनी भी प्रजा हो ऋणी न हो, ऋणी होने पर महाराजा द्वारा इसे चुकाया जाएगा।

हालांकि भारत के बाहर इस नियम का कहीं पालन होने के प्रमाण नहीं है, लेकिन यहां महापुरुषों के संवत् उनके अनुनायियों ने श्रद्धावश ही चलाए हैं। इनमें सर्वमान्य विक्रम संवत् ही है, क्योंकि महाराजा विक्रमादित्य ही वो महाराजा थे, जिन्होंने संपूर्ण देश यहां तक कि प्रजा के ऋण को भी चुकाकर इसे चलाया।

Read more
आपके राशि के अनुसार कैसा रहेगा आपके लिए वर्ष 2016

पूरी दुनिया 2016 के स्वागत के लिए तैयार है, आने वाले साल को लेकर नई उम्मीदें और आकांक्षाएं हैं लेकिन कहीं मन में दुविधा भी कि क्या आने वाला साल हमारे सारे सपने पूरे करेगा । आपके ऐसे ही कई सवालों के जवाब देने के लिए हम लेकर आए हैं राशिफल । 12 राशियों के लिए आने वाला साल कैसा है किसका सिक्का चमकेगा और कैसे आने वाली मुसीबतों से बचे ये सब पता चलेगा आपको आपके राशिफल से ।

मेष (Aries)- मेष राशि वाले जातकों के लिए साल 2016 उत्तम स्वास्थ्य और भाग्योदय प्रदान करने वाला है। आर्थिक विषयों को सुनियोजित करना आवश्यक रहेगा। बढ़िया आमदनी होने पर भी जब-तब मंदी का अनुभव करेंगे। राहू 30 जनवरी से सिंह राशि में गुरु के साथ युति में आएगा जिससे भाग्य का साथ थोड़ा कम मिलेगा और निर्णय लेने में सावधानी बरतनी होगी। विद्यार्थियों के लिए यह साल सिद्धि प्रदाता साबित होगा। विदेश से संबंधित कामकाज रुके हों तो वह पूरे होते दिखाई दे रहे हैं। गुरु, 11 अगस्त 2016 को कन्या राशि में प्रवेश कर रहा है। इस समय के बाद कोर्ट कचहरी, विदेश से संबंधित तथा उधार-वसूली के काम में सफलता मिलती दिखाई दे रही है। नौकरीपेशा वर्ग के लिए यह वर्ष सफलतादायक साबित होगा। पदोन्नति का अवसर आने की पूरी संभावना बन रही है।

वृषभ (Taurus)- वृषभ राशि के जातकों के लिए साल 2016 जन्म राशि से सातवें भाव में शनि और चतुर्थ भाव में गुरु तथा पंचम भाव में राहु महाराज का गोचर भ्रमण से शुरू हो रहा है। मंगल के घर का शनि सातवें घर में बैठकर आपके दांपत्य जीवन और भागीदारी के संबंधों में सावधानी बरतने की सूचना दे रहा है। भाग्य में अवरोध आता दिख रहा है। धर्म की तरफ आपका झुकाव अधिक रहेगा। पिता के साथ सबंधों में कड़वाहट आ सकती है। विदेशगमन की योजना बना रहे हैं तो अवरोध आ सकते हैं। विचारों में नकारात्मकता रहेगी। आपकी लोकप्रियता और सार्वजनिक प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। 2016 के मध्य में गुरु महाराज का पांचवें भाव में गोचर भ्रमण अविवाहित लोगों के लिए आशा की किरण लाएगा। भागीदारी के लिए भी अनुकूल समय है। मित्र और भाई से लाभ होगा। आत्मविश्वास में वृद्धि होगी।

मिथुन(Gemini)- नया साल 2016, मिथुन राशि के जातकों के लिए शुभ संदेश लाने वाला है। आपका राशि स्वामी बुध, धनु राशि से गोचर भ्रमण शुरू कर राशि चक्र पूरा कर फिर से धनु राशि में आ गया है। आप बुध प्रधान व्यक्ति हैं, इसलिए बुध के प्रभाव के चलते जीवन के विविध पहलुओं में सफलता हासिल करेंगे। गुरु, तीसरे स्थान में आपकी राशि के लिए शुभ फलदायी रहेंगे। महत्वपूर्ण यात्रा और भेंट-मुलाकात, सबंधों में निकटता और सौहार्द बढ़ेगा तथा उसकी उपयोगिता आप अच्छी तरह समझ सकेंगे। भाई-बहन या अन्य सगे-संबंधियों से सहयोग मिलेगा। जीवन के कई महत्वपूर्ण काम इस समय शुरू कर सकेंगे। बृहस्पति के शुभ प्रभाव का लाभ उठाकर आगे बढ़ेंगे। वर्ष के उत्तरार्ध में गुरु का चतुर्थ भाव में भ्रमण सुखद प्रसंगों का संकेत दे रहा है। जमीन-मकान और वाहन संबंधी मामलों में समाधान मिलेगा।

कर्क (Cancer) – वर्ष के शुरुआत में ही आपकी राशि से दूसरे भाव में गुरु का गोचर आपको वित्तीय रूप से और परिवार के संबंध में सकारात्मक संकेत दे रहा है। गुरु की पांचवीं दृष्टि रोग, शत्रु, ननिहाल पक्ष और दैनिक आमदनी तथा नौकरी के स्थान पर पड़ने से, इन सभी विषयों में आपको मन की शांति और स्थिरता दिखाई देगी। सातवीं दृष्टि आपकी राशि से आठवें स्थान पर होने से अचानक धन लाभ, वसीयत के कार्यों में समाधान का संकेत दे रही है। लंबे समय से किसी बीमारी से ग्रसित थे तो उससे मुक्ति मिलेगी। आपके कर्म स्थान पर भी गुरु की दसवीं दृष्टि कारोबार में उन्नति की संभावनाओं की सूचना दे रही है। आपकी लोकप्रियता में वृद्धि होगी। आपका हर काम निर्विघ्न पूरा होगा। राहु की गुरु के साथ युति होने के बाद आर्थिक विषय में कोई गलत निर्णय न हो जाए, इसका ध्यान रखें।

सिंह (Leo) – साल 2016 के अगस्त महीने तक गुरु का गोचर चलने से आपकी राशि के लिए समय बेहतर रहेगा। आप आत्मविश्वास से भरे रहेंगे। शारीरिक तंदुरस्ती भी बढ़िया रहेगी। गुरु की पांचवी दृष्टि प्रेम और संतान स्थान पर होने से आपके लिए अनुकूल संकेत है। कालपुरुष की कुंडली में भी पांचवें स्थान का स्वामी सूर्यदेव होते हैं और ज्ञान के देव गुरु का गोचर इस वर्ष को आपकी जिंदगी का यादगार वर्ष बनाएगा। संतान संबंधी मामलों का समाधान होगा। पढ़ाई करने वाले जातकों को सफलता मिलने की पूरी संभावना है। प्रेम-प्रसंग में आनंद का अहसास होगा। शेयर मार्केट में सोच-विचार कर उठाया गया जोखिम फायदा कराएगा। वैवाहिक जीवन भी सुखद रहेगा। जीवनसाथी का साथ और पूरा सहयोग मिलेगा। विवाह के इच्छुक जातकों की योग्य जीवनसाथी की खोज पूरी हो सकती है।

कन्या (Virgo) – आपकी राशि से गोचर के राहु का भ्रमण चल रहा है। लेकिन 2016 की शुरुआत में ही वह राशि बदलकर सिंह राशि में बारहवें राहु का भ्रमण चालू करेगा। बारहवें राहु के गोचर भ्रमण के दौरान आपको विशेष ध्यान रखने की सलाह है। बड़ा नुकसान या अनहोनी न हो, इसका ध्यान रखें। विदेशगमन की प्लानिंग कर रहे हैं तो उत्तम योग है। कोर्ट कचहरी के मामलों में सावधानी रखें। कानूनी दावा या किसी के साथ झगड़े-विवाद में न पड़ें अन्यथा मानसिक परेशानी हो सकती है। बारहवां स्थान चौथे स्थान के त्रिकोण स्थान में होने से मन पर अधिक बोझ रहेगा और मानसिक उथल पुथल होगी। घर से दूर रहने के अवसर आएंगे। बारहवें गुरु महाराज की उपस्थिति आपको वित्तीय विषयों में अनुकूल संकेत दे रही है। अगस्त 2016 में गुरु के राशि परिवर्तन कर आपकी ही राशि में होने से आपको अधिक राहत मिलेगी।

तुला (Libra) – 2016 की शुरुआत में ही आपका राशि स्वामी शुक्र, आपकी राशि से दूसरे धन स्थान में और परिवार स्थान में 19 जनवरी तक रहेगा। यह शुक्र आपके लिए राजयोग कारक शनि के साथ युति में है। आपका पूरे वर्ष कुटुंब भावना और वित्तीय परिस्थिति में अनुकूल रहेगा। राशि स्वामी पूरे वर्ष भ्रमण कर वर्ष के अंत में कुंभ राशि में रहेगा। शुक्र के इस भ्रमण के दौरान आप पारिवारिक और वित्तीय कार्यक्रमों में व्यस्त रहेंगे। समय का राजा सूर्य आपकी राशि से तीसरे साहस और पराक्रम स्थान तथा भातृ स्थान में भ्रमण कर रहा होगा। यह सूर्य सातवीं दृष्टि से भाग्यस्थान को देख रहा है। साहस का कारक और धन स्थान का स्वामी मंगल आपकी राशि में गोचर भ्रमण शुरू कर वर्ष के अंत में कुंभ राशि में आएगा। इस समय आप किसी के साथ प्रेम की गांठ में बंधेंगे या विवाह भी कर सकते हैं। दुस्साहस न हो इसका ध्यान रखें।

वृश्चिक (Scorpio) –वर्ष के आरंभ में आपका राशि स्वामी मंगल, आपकी राशि से बारहवीं शुक्र की तुला राशि में भ्रमण कर रहा है जिससे पूरे साल आप रंगीन मिजाज में रहेंगे। विदेश जाने की प्लानिंग के साथ साल की शुरुआत होगी। दान-धर्म और अध्यात्म में रुचि अधिक रहेगी। अस्पताल के चक्कर न लगाने पड़ें, इसका ध्यान रखें। शुक्र-मंगल के परिवर्तन से वर्ष का आंरभ होने से आपके पसंदीदा व्यक्ति से मिलने की मनोकामना पूरी होती दिखेगी। शनि महाराज मेहनत करवाएंगे। आपकी राशि में शनि का भ्रमण आपको नकारात्मक विचार की तरफ ले जाने का प्रयास करेगा। ऐसे समय मानसिक स्थिरता के लिए योग और प्राणायाम का सहारा लें। कर्मस्थान में गुरु की उपस्थिति आपके कार्य को विशालता प्रदान करेगी। बड़े-बड़े प्रोजेक्ट पर काम करना होगा। अपना मकान लेने या मौजूदा घर में सजावट, फर्नीचर, रेनोवेशन का विचार चल रहा हो तो खर्च आपकी अपेक्षा से अधिक न हो जाए, इसकी सावधानी रखें।

धनु (Sagittarius) – साल 2016 की शुरुआत से ही आपका राशि स्वामी गुरु, भाग्यस्थान में गोचर करता रहेगा जिससे आपके भाग्य का दरवाजा खुल सकता है। साथ ही वर्ष के अंतिम चरण में गुरु, आपके कर्मस्थान में कामकाज में विस्तार का संकेत दे रहा है। पैसा, साहस, पराक्रम और परिवार के पोर्टफोलियो वाली आपकी राशि के लिए शनि महाराज वर्ष के दौरान बारहवीं वृश्चिक राशि में रहेंगे, जिससे धन का व्यय होने की संभावना विशेष रहेगी। संभव हो तो वहां तक मर्यादित आमदनी के सामने बढ़ते खर्च को नियंत्रित कर बचत और सुरक्षित निवेश पर ध्यान दें। बेकार साहस करने से नुकसान हो सकता है। बारहवां शनि होने से कर्ज, उधारी या लोन से मुक्ति में लोहे के चने चबाने जैसी स्थिति हो सकती है। राहू की भाग्य स्थान में उपस्थिति के कारण विदेशगमन से आर्थिक लाभ का संकेत मिल रहा है। कुल मिलाकर यह साल आपके लिए सकारात्मक रहेगा।

मकर (Capricorn) – आपका राशि स्वामी शनि, नए साल में आपके लाभ स्थान में ही भ्रमण करेगा, जिससे आपको चारों ओर से मिल रहे लाभ में व्यवधान आने की संभावना है। बड़े भाई-बहन या मित्रों का सहयोग मिलेगा। आपके अष्टम स्थान का स्वामी सूर्य व्यय स्थान में धनु राशि में होने से बीमारी से ग्रसित होने की संभावना है। विशेषकर मौसमी बीमारियां आपके कार्यक्रम में व्यवधान उत्पन्न करेंगी जिससे आपमें व्याकुलता अधिक रहेगी। चतुर्थ और लाभ स्थान का स्वामी मंगल दसवें घर में रहकर आपके चतुर्थ स्थान और पंचम स्थान पर दृष्टि डाल रहा है। इस समय आपको जमीन, मकान या किसी भी अचल संपत्ति से लाभ होगा। शेयर-सट्टे के रास्ते लाभ पाने में सावधानी बरतें। मित्र आपसे दूर होते दिखेंगे। आठवें भाव में गुरु, अचानक वसीयत पाने का योग बनाएगा। शनि की दृष्टि मकर राशि पर होने से विचारों में नकारात्मक आएगी।

कुंभ (Aquarius) – कुंभ का राशि स्वामी शनि, 2016 की शुरुआत से अंत तक आपके कर्मस्थान में वृश्चिक राशि में भ्रमण कर रहा है। वर्ष की शुरुआत में राजयोग कारक ग्रह शुक्र के साथ शनि की युति होने से आपको काम-धंधे और लोकप्रियता में सफलता मिलेगी। विदेश के व्यापार-धंधे के लिए भी वर्ष अनुकूल रहेगा। धंधे में उधारी न रखें अन्यथा पैसा फंसने की संभावना है। मकान बदलने या रेनोवेशन का विचार कर रहे हैं तो साल 2016 अनुकूल है। अपेक्षा से अधिक खर्च न हो, इसका ध्यान रखें। जीवनसाथी की खोज में हैं तो वर्ष के अंत तक इंतजार करें, लेकिन धीरज का फल मीठा होगा। शनि, विलंब से लेकिन अच्छा फल देगा। गुरु का सातवें स्थान में गोचर आपको सार्वजनिक जीवन में ‘फील-गुड’ करवाएगा। विवाहित जातकों को उत्तम श्रेणी के दांपत्य जीवन का आनंद उठा सकेंगे।

मीन (Pisces) –वर्ष 2016 की शुरुआत में मीन राशि के जातकों का राशि स्वामी गुरु, सिंह राशि में आपकी राशि से छठे भाव यानी नौकरी, दैनिक आमदनी और रोग-शत्रु के स्थान में भ्रमण कर रहा है। यह गोचर आपको रोजगार संबंधी प्रगतिकारक फल दिलाएगा। आप लोकप्रियता की नर्इ शिखर पर चढ़ेंगे। वाद-विवाद और संघर्ष से मुक्ति मिलेगी। परिवार के साथ सबंधों में सुधार होगा। पैसे की तंगी से मुक्ति मिलेगी। छोटे-मोटे विघ्न और धीरज की परीक्षा लेने वाली परिस्थिति देखने को मिले तो उसे राहू का नकारात्मक प्रभाव कहा जा सकता है। विरोधियों और शत्रुओं की संख्या बढ़ेगी। लेकिन उनकी कोई भी चाल सफल नहीं होगी। भाग्य स्थान में शनि की उपस्थिति के कई प्रतिकूल प्रभाव दिखेंगे। शनि के कारण पिता और बड़ों के साथ किसी न किसी विषय में मनदुख होगा। यात्रा, विदेशगमन में विघ्न आ सकता है।

Read more