वाइन का एक ग्लास बढ़ा सकता है ज़िंदगी

अल्ज़ीमर के मरीजों के लिए एक अचछी खबर है । शोध से पता चला है कि जो अल्लोजीमर से पीड़ित वो लोग जो  बिल्कुल भी एल्कोहल नहीं लेते या जो ज्यादा लेते है उनकी तुलना में अल्जीमर से पीड़ित व्यक्ति जो एक ग्लास वाइन या 2-3 यूनिट एल्कोहल हर दिन लेते वो ज्यादा समय तक जीवित रहते हैं।

एक अनुमान के मुताबिक यूनाइटेड किंगडम में लगभग 8.5 लाख लोग अल्जीमर से ग्रस्त है और 2025 तक इनकी संख्या दस लाख होने का अनुमान है ।

कोपेनहेगन यबनिवर्सिटी के वैज्ञानिको के मुताबिक हो सकता है एल्कोहल पूरी तरह ज़िम्मेदार न हो बल्कि पब के माहौल के चलते हमें जवान महसूस करते हो लेकिन फिर भई इसमें कोई संदेह नहीं है कि वाइन की छोटी छोटी खुराक नुकसान नहीं पहुमचाती बल्कि स्वास्थ्य वर्द्धक होती है।

3 साल के समय के दौरान लगभग 321 ऐसे लोग जिन्हें युवा अवस्था में ही अल्जीमर हो गया था , उन पर रिसर्च किया गया । इन 321 लोगों में 8% लोग बिल्कुल भी एल्कोहल नहीं लेते थे ,वहीं 71 %लोग यदा कदा पीने वाले और  17% आदतन पीने वाले और 4%लोग हर दिन 2-3 यूनिट एल्कोहल लेते थे । इनमें से  53 लोेग की अध्धयन के दौरान ही  मृत्यु हो गई ।

फिर भी वैज्ञानिक कहते हैं कि हम अभी इस शोध के आधार पर एल्कोहल उपयोग को बढ़ाने की सलाह नहीं दे सकते । अल्जीमर एक सामान्य बीमारी है जिसमें व्यक्ति अपनी यादादाश्त का कुछ हिस्सा भूल जाता है ,हर साल लगभग 60 हज़ार लोग इसके चलते मौत के शिकार हो जाते हैं।

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अजन्में बच्चे का आॅपरेशन

कोच्चि ।  डॅाक्टर को हमेशा से भगवान का रूप कहा जाता है और कोच्चि की एक घटना ने इसे एक बार फिर सही साबित कर दिया । कोच्चि के अमृता इंस्टीट्यूट आॅफ मेडिकल साइंसेज एंड रिसर्च सेंटर के डॉक्टरों ने 29 सप्ताह के भ्रण का दिल का आॅपरेशन किया । दरअसल इस भ्रूण को ‘एऑर्टिक स्टिनोसिस’ नाम की बीमारी थी ,इस बीमारी  में वेंट्रिकल्स में खून का प्रवाह सामान्नय तरह से नहीं होता है, और हार्ट अटैक का ख़तरा बढ़ जाता है ।

इस ऑपरेशन के बाद डॉक्टरों को उम्मीद है कि जन्म के वक्त बच्चे में रक्त प्रवाह सामान्य रहेगा। डॉक्टर बालू वैद्यनाथन के नेतृत्व में हुए इस ऑपरेशन के बाद मां और भ्रूण की स्थिति सामान्य बताई जा रही है। वैद्यनाथन के अनुसार, “गर्भावस्था के आगामी सप्ताह में हम उम्मीद करते हैं कि वेंट्रिकुलर कार्यतंत्र बेहतर होगा और बच्चे का जन्म स्थिर रक्त प्रवाह के साथ होगा।”

 

 

 

 

 

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हल्दी के प्रयोग से रहें निरोग

हल्दी अपने गुणों के कारण रसोई की शान रही है। हल्दी न केवल एक मसाला है, बल्कि इसमें कई औषधीय गुण भी हैं। सौंदर्य प्रसाधनों में भी इसका इस्तेमाल किया जाता है। त्वचा, पेट और आघात आदि से उबरने में हल्दी अत्यंत उपयोगी होती है। पीले रंग के कारण भारतीय केसर के नाम से भी प्रसिद्ध है। आइए हम आपको हल्दी के गुणों के बारे में बताते हैं।
मसाले के रूप में प्रयोग की जाने वाली हल्दी का सही मात्रा में प्रयोग पेट में जलन एवं अल्सर की समस्या को दूर करने में बहुत ही लाभकारी होता है। हल्दी का पीला रंग कुरकमिन नामक अवयव के कारण होता है और यही चिकित्सा में प्रभावी होता है। चिकित्सा क्षेत्र के मुताबिक कुरकमिन पेट की बीमारियों जैसे जलन एवं अल्सर में काफी प्रभावी रहा है।
खांसी में हल्दी की गांठ का इस्तेमाल करें। अगर एकदम से खांसी आने लगे तो हल्दी की एक छोटी सी गांठ मुंह में रख कर चूसें, इससे खांसी नहीं आएगी। खांसी के साथ कफ की समस्या होने पर एक गिलास गर्म दूध में एक-चौथाई चम्मच हल्दी मिलाकर पीना फायदेमंद है।
सोते समय हल्दी की एक इंच लंबी कच्ची गांठ को एक गिलास दूध में उबालें। थोड़ा ठंडा होने पर इसे पी लें। ऑस्टियोपोरोसिस जैसे रोगों का खतरा कम होता है। हल्दी इन रोगों के इलाज के लिए अनूठा प्राकृतिक उपाय है। सुबह खाली पेट एक गिलास गर्म दूध में एम चम्मच हल्दी मिलाकर पीने से गठिया के दर्द में राहत मिलती है। हल्दी एनीमिया के इलाज के प्राकृतिक उपायों में एक है। कच्ची हल्दी से निकाला गया आधा चम्मच रस एक चम्मच शहद के साथ मिलाकर पीना फायदेमंद है।
दांतों को मजबूत बनाने के लिए हल्दी का प्रयोग करें। थोड़ी-सी हल्दी, नमक और सरसों का तेल मिलाएं। दांतों को मजबूत बनाने के लिए रोजाना इस मिश्रण से दांतों और मसूड़ों की ब्रशिंग करें। कच्ची हल्दी की गांठ को अच्छी तरह भून कर पीस लें। पिसे मिश्रण से दर्द वाले दांत की मालिश करें। आराम मिलेगा। कच्ची हल्दी के कसैले रस से मालिश करने पर दांत और मसूड़े मजबूत होते हैं, उनकी सूजन दूर होती है और दांत के कीड़े खत्म हो जाते हैं। एक गिलास पानी में कुछ हल्दी मिला कर कुल्ला करने से मुंह के छालों में आराम मिलता है।
गर्म दूध में हल्दी मिलाकर पीने से चोट के दर्द और सूजन में राहत मिलती है। चोट पर हल्दी और पानी का लेप लगाने से आराम मिलता है। आधा लीटर गर्म पानी, आधा चम्मच सेंधा नमक और एक चम्मच हल्दी डाल कर अच्छी तरह मिलाएं। इस पानी में एक कपड़ा डाल कर निचोड़ लें और चोट वाली जगह पर इससे सिंकाई करें। घी या तेल में हल्दी मिलाएं। इसे थोड़ा गर्म करके घाव के ऊपर लगाकर ड्रेसिंग करें।
अगर आप अनचाहे बालों से परेशान हैं तो हल्दी का प्रयोग करें। अनचाहे बालों को हटाने के लिए हल्दी पाउडर को गुनगुने नारियल तेल में मिलाकर पेस्ट बना लें। अब इस पेस्ट को अनचाहे बालों पर लगाएं। इस उपाय से शरीर के अनचाहे बाल धीरे-धीरे हट जाते हैं और त्वचा कोमल हो जाती हैं।

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ग्रीन टी भी देती है साइड इफेक्टस

न्यूयार्क । आमतौर पर ग्रीन टी को आम चाय की तुलना में ज्यादा फायदेमंद माना जाता है ,लेकिन ग्रीन टी के शौकीनो के लिए एक बुरी खबर है। कैलीफोर्निया यूनिवर्सिटी के नए रिसर्च के मुताबिक ज्यादा ग्रीन टी पीने से प्रजनन क्षमता पर बुरा असर पड़ता है ।

मक्खियों पर किए गए इस रिसर्च में पाया गया कि अधिक ग्रीन टी की खपत के चलते मक्खियों का निकास ऐर प्रजनन क्षमता प्रभावित हुई है फार्मास्युटिकल साइंसेज के सह-प्राध्यापक महताब जाफरी कहती हैं, “ग्रीन टी के उचित सेवन से स्वास्थ्य पर अनुकूल प्रभाव होता है, वहीं इसका अत्यधिक सेवन शरीर के लिए हानिकारक हो सकता है।” उन्होंने बताया कि कोई ठोस निर्णय देने से पहले अभी हमें इस शोध पर काफी काम करना है, लेकिन हमारा सुझाव है कि इसका कम मात्रा में सेवन करना चाहिए।

वैज्ञानिकों ने ड्रोसोफिला मेलानोगास्टर फ्रूट फ्लाई पर ग्रीन टी के हानिकारक प्रभावों का परीक्षण किया है। उन्होंने देखा कि जिन मक्खियों के लार्वा और भ्रूण ग्रीन टी पॉलीफिनाल्स (एंटी ऑक्सीडेंट) पर निर्भर थे उनकी संतानों में विकास की गति धीमी और अजीब बदलाव देखे गए। जाफरी का मानना है कि ग्रीन टी की ज़्यादा खुराक की वजह से कोशिकाएं मरने लगती हैं।
उन्होंने बताया, “केमेलिया सिनेसिस से उत्पन्न ग्रीन टी पूरी दुनिया में अपने गुणों के लिए मशहूर है। लेकिन जब हमने इसका परीक्षण चूहों और कुत्तों पर किया, तो ग्रीन टी की अधिक मात्रा से उनका वजन कम हो गया और भ्रूण का विकास भी प्रभावित हुआ।”

 

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नहीं है सुरक्षित ई-सिगरेट

अगर आप सिगरेट पीने की आदत से छुटकारा पाने के लिए ई-सिगरेट के बारे में सोच रहे है तो, ज़रा रूकिए ये खबर आपके लिए है । हावर्ड यूनिवर्सिटी के टेलर हेस के एक शोध के अनुसार लंबे समय तक ई-सिगरेट पीने से आपको घातक बीमारी हो सकती है विशेष, रूप से सांसों से संबधित बीमारी होने की आशंका काफी बढ़ जाती है।

अपने शोध में हेस ने लगभग 51 प्रकार की ई-सिगरेट की जांच की और पाया कि इनमें से 47 उत्पादों में वो केमिकल पाए जाते है जो सांसो की बीमारी के लिए सबसेे अधिक ज़िम्मेदार होते हैं।

टेलर हेस का कहना है कि बाजार में ई-सिगरेट के काफी फ्लेवर्स मौज़ूद है लेकिन उपभोक्ता मुख्यतः उत्पादक की दया पर निर्भर करते है जिन्हे इन केमिकल्स की जानकारी लगभग न के बराबर होती है।

सेन्टर फॅार डिसीज़ कंट्रोल एंड प्रिवेंशन की रिपोर्ट के अनुसार 2013 से 2014 के बीच ई-सिगरेट पीने वालों की संख्या में तीन गुना बढ़ोत्तरी हुई है। ई-सिगरेट के इस्तेमाल से पॅापकॅारन लंग्स नामकी बीमारी होने की संभावना बढ़ जाती है और इस बामारी में पीड़ित को अपने फेफड़े ट्रांस्पलांट कराने पड़ते है।

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सर्दियों में  निमोनिया के चपेट में क्‍यों आते हैं बच्‍चे

नई दिल्‍ली ।  जिस देश में  करोड़ों   लोग निमोनिया से पीड़ित हैं, वहां पर इसकी रोकथाम और जांच के बारे में खास कर सर्दियों में जागरूकता फैलाना बेहद आवश्यक है। इसका एक कारण यह भी है कि आम फ्लू, छाती के संक्रमण और लागातार खांसी के लक्षण इससे मेल खाते हैं।

निमोनिया असल में बैक्टीरिया, वायरस, फंगस या परजीवी से फेफड़ों में होने वाला एक किस्म का संक्रमण होता है, जो फेफड़ों में एक तरल पदार्थ जमा करके खून और ऑक्सीजन के बहाव में रुकावट पैदा करता है। बलगम वाली खांसी, सीने में दर्द, तेज बुखार और सांसों में तेजी निमोनिया के लक्षण हैं।

अगर आपको या आपके बच्चे को फ्लू या अत्यधिक जुकाम जैसे लक्षण हैं, जो ठीक नहीं हो रहे तो तुरंत डॉक्टर के पास जाकर सीने का एक्सरे करवाएं, ताकि निमोनिया होने या न होने का पता लगाया जा सके।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लयूएचओ) की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, स्ट्रेप्टोकोकस निमोनिया पांच साल से छोटी उम्र के बच्चों के अस्पताल में भर्ती होने व मृत्यु होने का प्रमुख कारण है।

इस बारे में इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) के महासचिव डॉ ने कहा, ‘छोटे बच्चे, नवजातों और समय पूर्व प्रसव से होने वाले बच्चे, जिनकी उम्र 24 से 59 महीने है और फेफड़े पूरी तरह विकसित नहीं हैं, हवा नली तंग है, कमजोर पौष्टिकता और रोगप्रतिरोधक प्रणाली वाले बच्चों को निमोनिया होने का ज्यादा खतरा होता है।’

उन्होंने कहा कि अस्वस्थ व अस्वच्छ वातावरण, कुपोषण और स्तनपान की कमी की वजह से निमोनिया से पीड़ित बच्चों की मौत हो सकती है, इस बारे में लोगों को जागरूक करना बेहद आवश्यक है।

निमोनिया कई तरीकों से फैल सकता है। वायरस और बैक्टीरीया अक्सर बच्चों के नाक या गले में पाए जाते हैं और अगर वह सांस से अंदर चले जाएं तो फेफड़ों में जा सकते हैं। वह खांसी या छींक की बूंदों से हवा नली के जरिये भी फैल सकते हैं। इसके साथ ही जन्म के समय या उसके तुरंत बाद रक्त के जरिये भी यह फैल सकता है।

वैक्सीन, उचित पौष्टिक आहार और पर्यावरण की स्वच्छता के जरिये निमोनिया रोका जा सकता है। निमोनिया के बैक्टीरिया का इलाज एंटीबायटिक से हो सकता है, लेकिन केवल एक तिहाई बच्चों को ही एंटीबायटिक्स मिल पा रहे हैं। इसलिए जरूरी है कि सर्दियों में बच्चों को गर्म रखा जाए, धूप लगवाई जाए। यह भी जरूरी है कि उन्हें उचित पौष्टिक आहार और आवश्यक वैक्सीन मिले।

नियूमोकोकल कोंजूगेट वैक्सीन और हायमोफील्स एनफलुएंजा टाईप बी दो प्रमुख वैक्सीन हैं, जो निमोनिया से बचाती हैं। लेकिन 70 प्रतिशत बच्चों को महंगी कीमत और जानकारी के अभाव की वजह से यह वैक्सीन लगवाई नहीं जाती।

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लंदन। यह बात बेहद हैरान करने वाली है कि व्यक्तिगत रूप से की गई देखभाल डायबिटिक पीड़ित महिलाओं में मृत्यु दर को कम करता है। एक नए अध्ययन में इस बात का खुलासा हुआ।

महिलाओं पर किए गए 13 साल के सर्वेक्षण में सामने आया कि जिन महिलाओं की व्यक्तिगत तौर पर देखभाल की गई, उनमें अन्य कारणों को लेकर मृत्यु दर में 26 फीसदी की कमी और मधुमेह संबंधी रोग में 30 फीसदी की कमी दर्ज की गई।

इसके अलावा, व्यक्तिगत देखभाल के तहत महिलाओं में हृदयाघात की संभावना 41 प्रतिशत कम हुई और मधुमेह के साथ ही दूसरा रोग होने के खतरे में 35 फीसदी की कमी देखी गई।

डेनमार्क के कोपनहेगेन यूनिवर्सिटी के मुख्य शोधार्थी मारलिनी क्रैग के अनुसार, ‘‘व्यक्तिगत ढंग से देखभाल, समुचित ध्यान और समर्थन महिलाओं को बीमारी से लड़ने के लिए प्रोत्साहत करता है।’’

महिलाओं को बीमारी आसानी से हो जाती है और उससे निपटने के लिए वे जल्द ही तैयार हो जाती हैं। यही प्रवृत्ति लंबे समय तक परिणामों को प्रभावित करती है।

वहीं दूसरी ओर पुरुषों में उनका पुरुषत्व ग्रसित धारणा और जीवनशैली में परिवर्तन की मांग मधुमेह को चुनौती देती रहती है। यह संरचित व्यक्तिगत देखभाल पुरुषों पर कोई खास असर नहीं करती है।

साल 1989 से 1995 के बीच डेनमार्क में मधुमेह के मूल इलाज के सामान्य परीक्षण के दौरान इलाज में हस्तक्षेप कर मरीजों (पुरुषों और महिलाओं) को संरचित व्यक्तिगत देखभाल दी गई। जिसके बाद एक नई टाइप 2 डायबिटीज (मधुमेह) सामने आया।

इस हस्तक्षेप करने वाले समहू ने रोगियों में खानपान और शारीरिक गतिविधियों पर जोर देने, समय पर दवाओं का सेवन करने और प्रत्येक रोगी को अलग कार्यों के लक्ष्य दिए। इसकी हर तीन महीनों में समीक्षा की गई।

13 सालों तक हुए इस अध्ययन से सामने आया कि व्यक्तिगत देखभाल मरीजों पर सकारात्मक प्रभाव डालती है। लेकिन इससे पुरुष नहीं केवल महिलाएं ही प्रभावित होती हैं ।

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लंदन : एक्यूपंक्चर से माइग्रेन या अधकपारी से राहत मिल सकती है। परंपरागत उपचार पद्धति के विशेषज्ञों का मानना है कि माइग्रेन से छुटकारे के लिए कान में एक्यूपंक्चर करवाना लाभदायक हो सकता है। कान छिदवाने (डैथ या डॉथ पियर्सिंग) से भी समान नतीजे मिल सकते हैं। हालांकि इसे अभी तक पूरी तरह प्रमाणित नहीं किया गया है। विशेषज्ञों के अनुसार, कान के एक खास हिस्से में माइग्रेन को नियंत्रित करने वाला दबाव बिंदु होता है। अगर उस बिंदु पर एक्यूपंक्चर किया जाए तो इससे सिर के इस दर्द से छुटकारा मिल सकता है।

विशेषज्ञों के मुताबिक यह दबाव बिंदु कान के छिद्र के ठीक ऊपर उस जगह होता है जहां कान के बाहरी सिरे का एक छोर नीचे घूमकर अंदर की ओर मुडम होता है। वास्तव में यह दबाव बिंदु उपास्थि से बने उस घुमाव में ही होता है। इसलिए उसी पर एक्यूपंक्चर किया जाता है। अनेक लोग, खासकर महिलाएं आभूषण पहनने के लिए कान के भीतरी हिस्से में छेद करवाती हैं। उस हिस्से में छेद कराने का उपचार की दृष्टि से भी महत्व है। इसलिए कई बार आभूषण पहनने के लिए छेद कराने के बाद अगर व्यक्ति को माइग्रेन की शिकायत है तो उसमें सुधार भी दिखने लगता है।

दरअसल, कान छिदवाने से अनजाने ही उस दबाव बिंदु पर एक्युपंक्चर हो जाता है जो माइग्रेन को ठीक करने से जुड़ा होता है। एक्यूपंक्चर चीन की परंपरागत उपचार पद्धति है जो दो हजार साल से भी अधिक पुरानी है। इसमें विभिन्न रोगों के उपचार के लिए शरीर के विभिन्न हिस्सों में दबाव बिंदुओं पर सुई से छेद अर्थात पंक्चर किया जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार, सुई चुभाकर एक्यूपंक्चर करने से उस दबाव बिंदु के इर्द गिर्द मौजूद रक्त वाहिनियां खुलकर अपेक्षाकृत फैल जाती हैं। इससे दबाव बिंदु के करीबी उत्तकों में होने वाला रक्त प्रवाह बढ़ जाता है।

2012 में ‘आर्काइव्स ऑफ इंटरनल मेडिसिन’ में प्रकाशित एक रिपोर्ट में कहा गया था कि माइग्रेन समेत कई मामलों में दवाओं और अधिकतर डॉक्टरों द्वारा सुझाए जाने वाले अभ्यास के मुकाबले एक्यूपंक्चर दोगुना प्रभावी पाया गया। यह रिपोर्ट ब्रिटेन, अमेरिका और जर्मनी की आठ यूनिवर्सिटी और अस्पतालों के करीब 18 हजार मरीजों और डॉक्टरों के विश्लेषण पर आधारित थी। माइग्रेन रिलीफ सेंटर भी माइग्रेन के लक्षणों और कान छिदवाने के बीच के रिश्ते को स्वीकार करता है। हालांकि यह अभी तक अप्रमाणित ही है, क्योंकि अब तक इसका कोई आधिकारिक अध्ययन नहीं किया गया है।

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