कर्मों के इस खेल को जानिए कर्मों के इस खेल को जानिए
कर्म क्या है? दादाश्री का ऐसा माना है ”कोई भी कार्य करो, उसे ‘मैं करता हूँ’ ऐसा आधार दो, वह कर्म की परिभाषा है।... कर्मों के इस खेल को जानिए

कर्म क्या है?

दादाश्री का ऐसा माना है ”कोई भी कार्य करो, उसे ‘मैं करता हूँ’ ऐसा आधार दो, वह कर्म की परिभाषा है। ‘मैं करता हूँ’ ऐसा आधार दें, उसे ‘कर्म बाँधा’ कहा जाता है। ‘मैं नहीं करता’ और ‘कौन करता है’ वह जान लो, तो इसे निराधार करते हो न, तब कर्म गिर जाता है” 

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कर्म के प्रकार 

इन तीन प्रकार के कर्मों का संचय हमारी संस्कार भूमिका में होता है। चित्रगुप्त का परिचय लेख के अंतर्गत पाठक पढ़ चुके हैं कि मनुष्य की अंतःचेतना ऐसी निष्पक्ष, निर्मल, न्यायशील और विवेकवान है कि अपने पराए का कुछ भी भेदभाव करके सत्यनिष्ठ न्यायाधीश की तरह हर एक भलेबुरे काम का विवरण अंकित करती रहती है।    

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संचित

संचित का अर्थ है – संपूर्ण, कुलयोग| अर्थात, मात्र इस जीवन के ही नहीं अपितु पूर्वजन्मों के सभी कर्म जो आपने उन जन्मों में किये हैं| आपने इन कर्मों को एकत्र करके अपने खाते में डाल लिया है| यदि कोई आप का अपमान करे और आप क्रोधित हो जाएँ तो आपके संचित कर्म बढ़ जाते हैं| परन्तु,यदि कोई अपमान करे और आप क्रोध ना करें तो आप के संचित कर्म कम होते हैं|

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प्रारब्ध 

‘प्रारब्ध’, ‘संचित’ का एक भाग, इस जीवन के कर्म हैं| आप सभी संचित कर्म इस जन्म में नहीं भोग सकते क्यूंकि यह बहुत से पूर्वजन्मों का बहुत बड़ा संग्रह है| इसलिए इस जीवन में आप जो कर्म करते हैं, प्रारब्ध, वो आप के संचित कर्म में से घटा दिया जायेगा| इस प्रकार इस जीवन में आप केवल प्रारब्ध भोगेंगे,जो आप के कुल कर्मों का एक भाग है|वे मानसिक कर्म होते हैं, जो स्वेच्छापूर्वक जानबूझकर, तीव्र भावनाओं से प्रेरित होकर किए जाते हैं।

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क्रियमाण 

तीसरा कर्म क्रियमाण है,कर्म शारीरिक हैं, जिनका फल प्रायः साथ के साथ ही मिलता रहता है। नशा पिया कि उन्माद आया।विष खाया कि मृत्यु हुई। शरीर जड़ तत्त्वों का बना हुआ है। भौतिक तत्त्व स्थूलता प्रधान होते हैं। उसमें तुरंत ही बदला मिलता है। अग्नि के छूते ही हाथ जल जाता है। नियम के विरुद्ध आहारविहारकरने पर रोगों की पीड़ा का, निर्बलता का अविलम्ब आक्रमण हो जाता है और उसकी शुद्धि भी शीघ्र हो जाती है।

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